रिश्तों की खूबसूरती उनकी मर्यादाओं में है। प्यार जब अपनी सीमाएं भूलकर वासना का चोला ओढ़ लेता है, तो वह 'रिश्ता' नहीं, बल्कि एक 'कलंक' बन जाता है। हमें एक ऐसे समाज की जरूरत है जहाँ घर के बड़े बच्चों के लिए ढाल बनें, न कि उनके बचपन को कुचलने वाले शिकारी।
यह शीर्षक——सुनने में जितना विचलित करने वाला है, इसके पीछे छिपी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतें उतनी ही गहरी और डरावनी हैं। जब हम 'सगे संबंधियों' के बीच मर्यादाओं के टूटने की बात करते हैं, तो यह केवल एक अनैतिक कृत्य नहीं, बल्कि उस 'भरोसे' की हत्या है जिस पर पूरा समाज टिका है। तो वह 'रिश्ता' नहीं
एक परिवार में दादा-पोती या नाना-नतिनी का रिश्ता निस्वार्थ प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। जब यही प्रेम अपनी सीमाएं लांघकर 'नाजायज' मोड़ ले लेता है, तो वह केवल एक रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि उस मासूम का पूरा संसार उजड़ जाता है। वह सुरक्षा, जो उसे घर की चारदीवारी में मिलनी चाहिए थी, वहीं से डर का जन्म होने लगता है। तो वह 'रिश्ता' नहीं